गऱीबी शायरी

गरीब के आँसुओ की कोई क़ीमत ही न रही,
बस एक कागज पर जब तस्वीर उसकी देखी।
जब लोग मर रहे थे भूख और प्यास से,
बस आज उस ग़रीब की तस्वीर बिकती देखी।
जीते जी उनके आँसुओ को हम ना पोंछ सकें,
बस जब भी देखा उसकी सांसे अटकी देखी।
लेख़क : वाज़िद टाईगर सिज़ोहान

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